MP News : मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी का खुलासा
MP News : मध्यप्रदेश विधानसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उच्च शिक्षा विभाग ने चौंकाने वाला खुलासा किया है। प्रदेश के 17 परंपरागत सरकारी विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापकों के कुल 1,069 स्वीकृत पदों में से 793 पद आज भी रिक्त हैं। इसका अर्थ है कि 74 प्रतिशत पदों पर अभी तक नियुक्तियां नहीं की गई हैं। इससे प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पांच विश्वविद्यालयों में एक भी सहायक प्राध्यापक की नियुक्ति नहीं की गई है। राजधानी भोपाल स्थित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय में 61 पदों में से 33 खाली हैं, जबकि भोज मुक्त विश्वविद्यालय में 34 पदों में से केवल 4 भरे गए हैं। अटल बिहारी हिंदी विश्वविद्यालय में मात्र 13 सहायक प्राध्यापक कार्यरत हैं।
गंभीर संकट में उच्च शिक्षा व्यवस्था
इन संस्थानों में शिक्षण कार्य मुख्य रूप से अतिथि फैकल्टी या अन्य विभागों के प्रोफेसरों के सहारे चलाया जा रहा है। जिन विश्वविद्यालयों में एक भी सहायक प्राध्यापक पदस्थ नहीं है, उनमें राजा शंकर शाह विश्वविद्यालय छिंदवाड़ा (2019) – 100 पद, महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय छतरपुर – 80 पद (2015), क्रांतिवीर तात्या टोपे विश्वविद्यालय गुना – 80 पद, क्रांतिसूर्य भील विश्वविद्यालय खरगोन – 30 पद और रानी अवंतीबाई लोधी विश्वविद्यालय सागर – 80 पद शामिल हैं।
नियुक्तियों की सुस्त रफ्तार और कारण
उच्च शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालयों में स्थायी नियुक्तियों की रफ्तार बेहद धीमी है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इसकी प्रमुख वजहें हैं: बजट स्वीकृति में देरी, पद सृजन और भर्ती प्रस्तावों में अड़चन, आरक्षण को लेकर नियमों की अस्पष्टता, जिससे विवाद खड़े हो जाते हैं। कई बार ऐसी जटिलताओं से बचने के लिए अधिकारी नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने से भी कतराते हैं। उदाहरण स्वरूप, वर्ष 2022 में बरकतउल्ला विश्वविद्यालय द्वारा शुरू की गई भर्ती प्रक्रिया तकनीकी कारणों से रद्द कर दी गई थी, जिसे 2025 में दोबारा शुरू किया गया, परंतु आरक्षण संबंधी पेच के कारण उसमें फिर से गड़बड़ी की बात सामने आई है।
अतिथि विद्वानों के सहारे व्यवस्था चलाना सस्ता विकल्प
सूत्रों के अनुसार, विवि और विभाग स्थायी नियुक्तियों से बचने के पीछे लागत का भी तर्क देते हैं। एक अतिथि विद्वान को लगभग ₹50,000 प्रतिमाह में नियुक्त किया जा सकता है, जबकि नियमित प्राध्यापक की नियुक्ति पर वेतन, भत्तों और सुविधाओं समेत लाखों रुपये का खर्च आता है।
निष्कर्ष: पारदर्शी और समयबद्ध नियुक्ति प्रक्रिया जरूरी
शिक्षकों के अभाव में शोध, पीएचडी, गुणवत्ता मूल्यांकन (NAAC/NIRF), और नए पाठ्यक्रमों का संचालन प्रभावित हो रहा है। कई विभागों में एक ही शिक्षक को दो-दो विभागों का कार्यभार दिया गया है, साथ ही प्रशासनिक कार्य भी इन्हीं पर निर्भर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक नियुक्तियों की प्रक्रिया पारदर्शिता और समयबद्धता के साथ नहीं चलाई जाएगी, तब तक प्रदेश की उच्च शिक्षा प्रणाली संकट से बाहर नहीं निकल पाएगी।