CG News: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, अनुसूचित जाति आयोग के आदेश को किया रद्द
CG News: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग के एक प्रमुख आदेश को रद्द करते हुए अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, हाई कोर्ट ने आयोग के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कोरबा के एक शासकीय कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर को एससी-एसटी अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था और उनके खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की सिफारिश की गई थी, अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी वैधानिक आयोग आपराधिक सजा सुनाने का अधिकार नहीं रखता है.
नकल का मामला दबाने और यौन उत्पीड़न का था आरोप
यह पूरा मामला कोरबा जिले के बरपाली सरकारी कॉलेज का है, जहां वर्ष 2019 में एक छात्रा ने असिस्टेंट प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव और उनके सहयोगी पर नकल पकड़ने के बाद मामले को दबाकर ब्लैकमेल करने और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था, हालांकि, पुलिस द्वारा की गई निष्पक्ष जांच में छात्रा के सभी आरोप पूरी तरह बेबुनियाद और असत्य पाए गए थे, जिसके बाद पुलिस ने मामले को बंद कर दिया था.
पुलिस जांच से असंतुष्ट होकर आयोग पहुंची थी छात्रा
पुलिस की जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट होकर छात्रा ने राज्य अनुसूचित जाति आयोग का दरवाजा खटखटाया था, मार्च 2021 में आयोग ने मामले की सुनवाई करते हुए एससी-एसटी अधिनियम की धारा 3(1) के तहत प्रोफेसर मृगेश कुमार यादव पर लगे आरोपों को सही करार दिया था और उनके विरुद्ध तत्काल एफआईआर दर्ज कराने का आदेश जारी कर दिया था, जिसे प्रोफेसर ने हाई कोर्ट में चुनौती दी.
वकील ने रखी वैधानिक मर्यादा की बात
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रोफेसर के वकील कबीर कलवानी ने तर्क दिया कि आयोग ने उन्हें दोषी ठहराकर अपनी निर्धारित वैधानिक शक्तियों का स्पष्ट उल्लंघन किया है, उन्होंने कहा कि आयोग एक सिफारिशी संस्था है, न कि कोई न्यायिक या सजा सुनाने वाली अदालत, वहीं आयोग की ओर से पेश वकील पूर्णिमा सिंह ने तर्क दिया कि यह केवल एक सलाहकारी निर्देश था, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देकर निरस्त किया निर्देश
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने आयोग की दलीलों को खारिज करते हुए आयोग की संवैधानिक सीमाओं को रेखांकित किया, शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के पूर्ववर्ती फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी आयोग के पास आपराधिक मामलों में अंतिम निर्णय या सजा सुनाने का अधिकार क्षेत्र नहीं है, इस टिप्पणी के साथ अदालत ने आयोग के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया.
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