Bihar News: सूर्य उपासना और तपस्या का प्रतीक : छठ महापर्व
Bihar News: बिहार में हर साल दिवाली के छह दिन बाद शुरू होने वाला छठ महापर्व सूर्य उपासना और मातृत्व की आराधना का प्रतीक है, इस वर्ष यह पावन पर्व 25 अक्टूबर से आरंभ हो रहा है, चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व न केवल तपस्या और संयम का प्रतीक है, बल्कि इसमें छठी मैया और सूर्यदेव की पूजा का विशेष महत्व होता है, श्रद्धालु नदी या तालाब के किनारे जाकर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं और परिवार की खुशहाली, आरोग्य और दीर्घायु की कामना करते हैं, मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि जब सृष्टि की रचना हो रही थी, तब देवी प्रकृति ने स्वयं को छह भागों में विभाजित किया था, उनमें से जो छठा भाग था, वह सबसे महत्वपूर्ण माना गया और उसी स्वरूप को छठी मैया के नाम से जाना गया, छठी मैया को ब्रह्मा जी की मानस पुत्री और मातृशक्ति का सर्वोच्च रूप कहा गया है, वे संतान की रक्षक देवी मानी जाती हैं और हर नवजात शिशु की सुरक्षा का आशीर्वाद देती हैं,
लोक मान्यता और किंवदंतियों के अनुसार
लोक मान्यता के अनुसार, किसी बच्चे के जन्म के बाद छठे दिन छठी मैया स्वयं आती हैं और उस शिशु के भविष्य का लेखा लिखती हैं, इसलिए यह तिथि विशेष रूप से शुभ मानी जाती है, किंवदंतियों के अनुसार, छठी मैया सूर्यदेव की बहन हैं, इस कारण छठ पर्व पर दोनों की एक साथ पूजा की जाती है, सूर्य को ऊर्जा, जीवन और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है, ऐसा विश्वास है कि छठ के दौरान जब श्रद्धालु सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो सूर्यदेव उनके जीवन से नकारात्मक ऊर्जा और रोगों का नाश कर, सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं, प्राचीन समय में एक राजा थे — प्रियंवद, जिनके कोई संतान नहीं थी, संतान प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने महर्षि कश्यप से सलाह ली, महर्षि ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने का निर्देश दिया, यज्ञ पूर्ण होने के बाद उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति से बनी खीर दी गई, जिससे उन्हें संतान की प्राप्ति तो हुई, लेकिन वह शिशु मृत जन्मा, शोक से व्याकुल राजा ने जीवन त्यागने का संकल्प लिया, तभी उनके समक्ष देवी षष्ठी प्रकट हुईं, देवी ने कहा — “हे राजन, मैं सृष्टि की पालनहार मातृशक्ति हूँ, यदि तुम मेरी विधिवत पूजा करोगे और अन्य लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करोगे, तो तुम्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी,”राजा ने श्रद्धा के साथ देवी षष्ठी का व्रत किया और उनकी कृपा से उन्हें जीवित संतान का आशीर्वाद मिला, तभी से संतान सुख की प्राप्ति और सुरक्षा के लिए छठ व्रत करने की परंपरा आरंभ हुई,
एक अन्य कथा के अनुसार, जब पांडव अपना राज्य हार चुके थे और संकट में थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को छठ व्रत करने का उपदेश दिया, द्रौपदी ने पूरे नियम, संयम और श्रद्धा से यह व्रत किया, उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उनका मनोकामना पूर्ण की और पांडवों को उनका खोया हुआ राजपाट पुनः प्राप्त हुआ, छठ केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि यह संयम, शुद्धता, आस्था और कृतज्ञता का प्रतीक है, इसमें व्रती बिना नमक, तेल और प्याज-लहसुन वाले भोजन का सेवन करते हैं, दिनभर उपवास रखते हैं और सूर्यास्त व सूर्योदय दोनों समय सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करते हैं, यह पर्व सिखाता है कि जब श्रद्धा और भक्ति सच्ची हो, तो जीवन में आने वाली हर कठिनाई को पार किया जा सकता है, छठ महापर्व, दरअसल, मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे आध्यात्मिक संबंध का उत्सव है — जहाँ सूर्य की ऊर्जा, जल की शुद्धता और माता की कृपा से जीवन में नई रोशनी का उदय होता है.