Chhattisgarh News : दिव्या महोबे की मिसाल: जब बेटी ने निभाया कर्तव्य और तोड़ी परंपरा की बेड़ियाँ

Chhattisgarh News : दिव्या महोबे की मिसाल: जब बेटी ने निभाया कर्तव्य और तोड़ी परंपरा की बेड़ियाँ

Chhattisgarh News : दिव्या महोबे की मिसाल: जब बेटी ने निभाया कर्तव्य और तोड़ी परंपरा की बेड़ियाँ

Chhattisgarh News : बेटियाँ केवल परंपराओं का पालन करने वाली नहीं होतीं — वे प्रेम, श्रद्धा और कर्तव्य की जीती-जागती मिसाल होती हैं। खैरागढ़ की दिव्या महोबे ने यही साबित किया। उन्होंने सामाजिक रीति-रिवाजों को चुनौती देकर यह दिखा दिया कि जब बात माता-पिता के कर्तव्य की हो, तो बेटा और बेटी में कोई अंतर नहीं होता।

एक सशक्त महिला का अवसान

हाल ही में खैरागढ़ की प्रतिष्ठित समाजसेविका, पूर्व पार्षद और महिला कांग्रेस की पूर्व शहर अध्यक्ष श्रीमती शिला रानी महोबे का आकस्मिक निधन हो गया। वे न केवल राजनीतिक रूप से सक्रिय थीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक विकास में भी उनका योगदान उल्लेखनीय था। उनका जीवन समाज सेवा को समर्पित था और उनके निधन से पूरे नगर में शोक की लहर दौड़ गई।

हर रोज़ की तरह वे उस दिन भी सुबह शीतला मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए गई थीं। लेकिन भगवान के समक्ष नमन करते समय उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं ने तत्परता दिखाते हुए उन्हें सिविल अस्पताल पहुंचाया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। यह समाचार पूरे शहर में तेजी से फैल गया और हर आंख नम हो गई।

जब बेटी बनी संस्कारों की वाहक

इस भावुक और कठिन क्षण में उनकी बड़ी बेटी दिव्या महोबे ने जो निर्णय लिया, उसने न केवल सामाजिक परंपराओं को तोड़ा, बल्कि एक नई सोच को जन्म दिया। परंपरागत रूप से मुखाग्नि देने का अधिकार बेटों या पुरुष सदस्यों को दिया जाता है, लेकिन दिव्या ने सफेद साड़ी पहनकर स्वयं अपनी मां को मुखाग्नि दी। यह साहसिक कदम सिर्फ एक संस्कार नहीं था, बल्कि एक मजबूत सामाजिक संदेश भी था — कि कर्तव्य निभाने के लिए बेटा होना ज़रूरी नहीं, बल्कि भावना और निष्ठा ज़रूरी है। उनकी छोटी बहन दीक्षा महोबे भी हर क्षण साथ रहीं और दोनों बहनों ने मिलकर अपनी मां की अंतिम यात्रा को गरिमामयी और स्मरणीय बना दिया।

समाज का समर्थन और नई सोच की शुरुआत

खैरागढ़ के कृषि उपज मंडी मुक्तिधाम में हुए अंतिम संस्कार में नगर के अनेक लोग, राजनीतिक साथी और समाजसेवी उपस्थित हुए। हर किसी ने दिव्या की हिम्मत और उनके फैसले की सराहना की। यह दृश्य समाज की उस सोच को चुनौती देने वाला था, जिसमें बेटियों की भूमिका सीमित मानी जाती है।

निष्कर्ष: प्रेरणा का प्रतीक बनी दिव्या

दिव्या महोबे ने यह सिद्ध कर दिया कि कर्तव्य, प्रेम और संस्कार किसी लिंग पर निर्भर नहीं होते। यह केवल एक बेटी द्वारा दिया गया मुखाग्नि नहीं था, बल्कि यह एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत थी।

दिव्या का यह साहसिक कदम न केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगा, बल्कि यह भी साबित करेगा कि बेटियाँ भी वही सब कर सकती हैं, जो सदियों से बेटों के हिस्से माना जाता रहा है।

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