CG News: बेघर उम्मीद: 65 वर्षीय ध्याना बाई की अनसुनी पुकार

CG News: बेघर उम्मीद: 65 वर्षीय ध्याना बाई की अनसुनी पुकार

CG News: बेघर उम्मीद: 65 वर्षीय ध्याना बाई की अनसुनी पुकार
CG News: रायगढ़, छत्तीसगढ़: 65 वर्षीय ध्याना बाई बरेठ की आँखों के आँसू अब शायद सूख चुके हैं। सिस्टम की बेरुखी, गरीबी की मार और बेबसी का भारी बोझ उनकी कमजोर कंधों पर है। रायगढ़ के चक्रधर नगर में शनि मंदिर के पास, खुले आसमान के नीचे, धूप और बारिश की मार सहती यह बुजुर्ग महिला एक अदद ठिकाने के लिए भटक रही है। उनके पास सिर्फ़ एक बैग है, जिसमें कुछ फटे-पुराने कपड़े और अनगिनत उम्मीद भरी चिट्ठियाँ भरी हैं।

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक लगाई गुहार
ध्याना बाई ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत एक घर पाने की आस में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, गृहमंत्री विजय शर्मा और उपमुख्यमंत्री अरुण साव तक को कई बार पत्र लिखा है। उन्होंने मंत्रियों के बंगलों के अनगिनत चक्कर काटे हैं, अपनी व्यथा सुनाई है, लेकिन उनकी उम्मीद अब तक पूरी नहीं हुई है। विडंबना यह है कि घर मिलने की बजाय, उनसे उस घर के लिए 2 लाख 73 हजार रुपए जमा करने की मांग की गई है, जो शायद उनके लिए एक असंभव सपना है।

ध्याना बाई ने बयाँ किया दर्द
अपनी दुखभरी कहानी सुनाते हुए ध्याना बाई कहती हैं कि उनकी वृद्धा पेंशन ही एकमात्र सहारा है, जिससे दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती है। फिर भी, हर महीने वह जैसे-तैसे ट्रेन का टिकट जुटाकर रायपुर आती हैं और मंत्रियों के बंगलों के बाहर घंटों इंतजार करती हैं। कभी गार्ड यह कहकर टाल देता है कि मंत्री जी बाहर हैं, तो कभी उन्हें बिना किसी जवाब के निराश होकर लौटना पड़ता है।
ध्याना बाई की बस एक छोटी सी इच्छा है – जीते जी उन्हें सरकार एक छोटा सा घर दे दे, जहाँ वह अपना बुढ़ापा शांति से बिता सकें। उनकी बेबसी इस हद तक है कि उन्होंने यह तक कह दिया है कि उनकी मृत्यु के बाद सरकार उस मकान को वापस ले सकती है, यही उनकी अंतिम इच्छा है।

दफ्तरों के चक्कर लगाने को मजबूर

रायगढ़ नगर निगम के दफ्तरों के अनगिनत चक्कर लगा चुकी ध्याना बाई अब पूरी तरह से टूट चुकी हैं। पिछले साल उन्हें आवास योजना में एक मकान आवंटित तो हुआ था, लेकिन उस पर 2 लाख 73 हजार रुपए जमा करने की शर्त लगा दी गई। इतनी बड़ी रकम जुटा पाना उनके लिए नामुमकिन है, और इसी कारण वह देश के प्रधानमंत्री और प्रदेश सरकार के मंत्रियों से बार-बार गुहार लगा रही हैं।
उनकी जिंदगी का दर्दनाक पहलू यह भी है कि सालों पहले उनके पति ने मारपीट कर उन्हें बेसहारा छोड़ दिया था, तब से वह सड़कों पर ही भटक रही हैं। इस दौरान उन्हें चोर-उचक्कों का सामना करना पड़ा है, जिन्होंने उनके मामूली सामान को भी नहीं छोड़ा। इतना ही नहीं, इस बुजुर्ग महिला को सड़क पर छेड़छाड़ का शिकार भी होना पड़ा है। अपनी आपबीती सुनाते हुए उन्होंने बताया कि पेट भरने के लिए वह मजदूरी करने जम्मू कश्मीर भी गई थीं, जहाँ बस स्टैंड पर उनके बचे-खुचे गहने और थोड़े-बहुत रुपए भी चोरी हो गए, और जो कुछ बचा था, वह पुलिस ने ले लिया। बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर वह वापस छत्तीसगढ़ पहुंचीं और पिछले एक साल से रायगढ़ और रायपुर के बीच एक अदद घर की आस में भटक रही हैं, लेकिन उनकी मदद के लिए अब तक कोई आगे नहीं आया है। बार-बार नगर निगम के दफ्तर जाने पर अब तो अधिकारी भी उनसे चिढ़चिढ़ा जाते हैं और उन्हें दुत्कार कर भगा देते हैं।

ध्याना बाई के पास नगर निगम रायगढ़ का एक पत्र है, जो उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत चंद्रनगर में एक मकान आवंटित किए जाने की सूचना देता है। लॉटरी के माध्यम से उन्हें ब्लॉक डी में मकान नंबर 23 आवंटित किया गया है। लेकिन, उसी पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा है कि इस आवास का स्थायी कब्जा प्राप्त करने के लिए उन्हें 30 अगस्त, 2024 तक 2 लाख 73 हजार रुपए निगम कोष में जमा करने होंगे, अन्यथा उनका आवंटन निरस्त कर दिया जाएगा।

उम्मीद से भरी कई चिट्ठियाँ
ध्याना बाई के उस पुराने बैग में उम्मीद से भरी कई चिट्ठियाँ हैं, जो उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा को लिखी हैं। अपनी वृद्धा पेंशन के सहारे जिंदगी गुजार रही इस बेसहारा महिला का सवाल है कि मकान के बदले उनसे मांगी जा रही इतनी बड़ी रकम सरकार किसी और निधि या मद से क्यों नहीं जमा करा सकती? उनकी बस यही प्रार्थना है कि उन्हें एक छोटा सा घर मिल जाए, जिससे वह अपना बुढ़ापा शांति और सम्मान के साथ काट सकें।
यह कहानी हमारे सिस्टम की संवेदनहीनता और एक बेसहारा बुजुर्ग महिला की बेबसी की एक कड़वी सच्चाई बयान करती है। क्या ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा ध्याना बाई जैसी जरूरतमंदों तक कभी नहीं पहुँचेगा? क्या सरकार उनकी अंतिम इच्छा पूरी कर पाएगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब ध्याना बाई और उनके जैसे अनगिनत बेघर और बेसहारा लोग आज भी आस भरी निगाहों से इंतजार कर रहे हैं।

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