CG News : सिंहासन छत्तीसी: सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहटें और सुशासन के पर्दे के पीछे की कहानी!
CG News : छत्तीसगढ़ की राजनीति और प्रशासनिक गलियारे इन दिनों गर्माए हुए हैं। सीएम भले ही “सुशासन तिहार” मना रहे हों, लेकिन सरकार के कई विभागों में फैसलों की डोर अब मंत्रियों के नहीं बल्कि उनके ‘करीबियों’ के हाथों में नजर आ रही है। सवाल ये उठता है — क्या छत्तीसगढ़ की सरकार अब ठेके पर चल रही है?
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं जोरों पर हैं कि प्रदेश के कुछ अहम विभाग अब पूरी तरह से ‘अनौपचारिक सलाहकारों’ और ‘करीबी चेहरों’ के हवाले कर दिए गए हैं।
विभाग मंत्री के नाम, पर फैसले ‘करीबी’ के नाम!
• वन विभाग: छत्तीसगढ़, जो कि देश के सबसे बड़े फॉरेस्ट कवर वाले राज्यों में से एक है, इस विभाग की कमान एक अनुभवी आदिवासी मंत्री के पास है। लेकिन असली निर्णय लेने का काम किसी और के जिम्मे है — मंत्री के खासमखास ‘भाईसाहब’। क्या, कब और कितना होना है, ये सब वही तय करते हैं!
• कृषि विभाग: मंत्री के नाम पर विभाग चलता है, लेकिन फैसले वीआईपी रोड पर बनी एक होटल की तीसरी मंज़िल से जारी होते हैं। अब तो पहचान भी बन गई है — “काम है? तो होटल की तीसरी मंज़िल पर जाओ!”
• उद्योग विभाग: यहां तो एक नहीं, बल्कि त्रिमूर्ति का जलवा है। विभागीय बैठक हो या कोई अहम फ़ैसला, इन तीन खासमखास चेहरों की मौजूदगी और ‘हंसी-मजाक’ विभागीय संस्कृति का हिस्सा बन चुकी है।
सीएम के सचिव से नाराजगी — अनबोलापन और पावर ट्रांसफर!
राजनीतिक हलकों में खुसफुसाहट है कि मुख्यमंत्री और उनके एक भरोसेमंद सचिव के बीच अब ‘अनबोला’ हो चुका है। सीएम की नाराजगी इस हद तक है कि बातचीत तक बंद हो चुकी है। नतीजा — हाल ही में सचिव की अहम भूमिका से विदाई और उनके स्थान पर सीएम के दूसरे करीबी अफसर की ताजपोशी!
अब सीएम के हर कार्यक्रम में वही चेहरा नजर आता है। सलाह-मशवरे से लेकर फाइलों पर साइन तक, अब वही अफसर मुख्यमंत्री की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर हैं।
अय्यारों की टीम — बैचमेट्स की सत्ता में मजबूत पकड़!
छत्तीसगढ़ में इन दिनों एक खास बैच के पांच अफसरों का जबरदस्त वर्चस्व है। आईएएस, आईपीएस और राजनीतिक ‘सगे-संबंधी’ — सब मिलकर राज्य की सत्ता के केन्द्र बिंदु बन गए हैं। ये पंच तत्व तय कर रहे हैं कि किस अफसर का ट्रांसफर होगा, किसे अहम जिम्मेदारी दी जाएगी और कौन सी पोस्ट दिल्ली भेजी जाएगी।
कहते हैं राजनीति में दोस्ती से ज्यादा अहम होती है — नजदीकियों की सियासत। और यहां वो पूरी शिद्दत से खेला जा रहा है।
तो क्या छत्तीसगढ़ की सत्ता ठेके पर चल रही है?
सवाल अभी खुला है, जवाब भविष्य में मिलेगा। लेकिन इस वक्त राजनीति और प्रशासन के बीच उठते-गिरते समीकरण बताते हैं कि पर्दे के पीछे बहुत कुछ ऐसा है, जो आम जनता की नजरों से ओझल है।