Bilaspur High Court Verdict: आदिवासी महिला को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं, हिंदू उत्तराधिकार कानून लागू नहीं
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आदिवासी उत्तराधिकार कानून को लेकर एक अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जनजाति समुदाय की महिला तब तक हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत पैतृक संपत्ति में अधिकार का दावा नहीं कर सकती, जब तक यह प्रमाणित न हो जाए कि संबंधित जनजाति ने अपनी पारंपरिक उत्तराधिकार व्यवस्था को औपचारिक रूप से छोड़ दिया है।
यह महत्वपूर्ण निर्णय न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने आशावती बनाम रुखमणी एवं अन्य प्रकरण में सुनाया। कोर्ट ने 41 वर्ष पुराने नामांतरण और बंटवारे को चुनौती देने वाली अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया।
क्या था मामला
मामला बिंझवार जनजाति से संबंधित पैतृक संपत्ति के नामांतरण से जुड़ा था, जिसे चार दशक बाद चुनौती दी गई थी। अपीलकर्ता ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के आधार पर संपत्ति में अधिकार का दावा किया था।
हाईकोर्ट की अहम टिप्पणियां
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिंझवार जनजाति पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम स्वतः लागू नहीं होता।
साथ ही कहा गया कि-
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दशकों पुराने नामांतरण आदेशों को बिना ठोस धोखाधड़ी के सबूत के चुनौती नहीं दी जा सकती
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केवल लंबे समय बाद आपत्ति दर्ज कराना कानूनन स्वीकार्य नहीं है
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राजस्व रिकॉर्ड वर्षों से प्रभावी हों, तो उन्हें आसानी से अमान्य नहीं ठहराया जा सकता
क्यों माना जा रहा है यह फैसला अहम
यह निर्णय आदिवासी समुदायों की परंपरागत उत्तराधिकार व्यवस्था को संवैधानिक संरक्षण देता है और भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बनेगा।
हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि आदिवासी समाज के मामलों में सामान्य हिंदू कानूनों को लागू करने से पहले जनजातीय परंपराओं को समझना अनिवार्य है।